मुलाकात

वक़्त गुज़रता रहा, रातें सरकती रही

दिल तलाश न पाया वो चेहरा

चाँद सिसकता रहा, चाँदनी बरसती रही

अक्सर जलती गाह ने किया पहरा।

 

इक उम्मीद से दिल बहलता रहा

दूर चिराग़ नज़र आया

वो जलता बुझ्ता दीया कौन था?

वो नजरों का धोखा कहीं तुम तो नहीं।

 

यह झूठा मुआशरा,  यह झूठी लकीरें

हर वरक सें नज़र फेरा हमने

खामोशी का सबब कुछ यूँ पसरा

तेरे आहट की गूंज हर ओर सें लौटी

 

तुम मिले क्योंकि ज़िंदा तसव्वुफ थीं

उलझन हुई दिल को, गैरों ने जब शोर किया

उनकी बातें न रुकी पर आलम ज़रुर ठहर गया

अह्बाब की निगाह पड़ी मुझ पर, तो हंगामा कुछ और हुआ

 

अभी तो महज़ नज़र की तलाश खत्म हुई है

वह्मो को ठिकाना मिला है

सफ़र को मक़ाम तो तब हासिल होगा

जब लहरों के दरमियाँ ज़िंदगी बसर होगी।

 

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Author: indifferentmusing

I believe love, laughter and a thought spared for peace can overcome all the differences in the world.

4 thoughts on “मुलाकात”

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