कसूर

बर्किद्दार न थी वो शाम

रंग तो उतरने ही थे

जल्से कि हवा ठहर न सकी

बगावत तो रिश्तों ने करनी ही थी।

मशगूल किया ज़िंदगी ने यूँ

बज़्म में शामिल हम भी हुए, तुम भी थे गुम

फिर शिकायत कैसी, उस नये सलाम से?

कैसा रूठना इस बदले इंतेज़ाम से?

मुसल्सल मुड़ कर देखा, इंतज़ार किया

राब्ता तो कायम रखा, पर रिश्ता अज़ल न रहा

इसे हमारी बद्मिज़ाजी न समझना, क्योंकि

यूँ हीं तो नहीं किसी ने हमारी मुलाकातों को ग़ज़ल है कहा।

महज़ दोस्त नहीँ, नेह्मत थे हम

वक़्त के साथ हमनवाई जो बीती

माज़ी था वो, मुस्तक्बिल तो नहीं

अज़ाब जो बनी गुफ्तगू, किसका है कसूर?

Advertisements

Author: indifferentmusing

I believe love, laughter and a thought spared for peace can overcome all the differences in the world.

7 thoughts on “कसूर”

  1. न जाने कितने लोग जाने अंजाने में अपनों से अंजान हुए चले जा रहे
    Flawlessly written and an amazing piece of write 📝 up 🙂
    Keep writing and keep raising 😊

    Liked by 2 people

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s